जिले के भवनाथपुर और मंझिआंव क्षेत्रों में हो रहे अनियंत्रित पत्थर खनन ने क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को मज़बूत तो किया है, लेकिन इसके नतीजे खतरनाक रूप से सामने आ रहे हैं। धूल, प्रदूषण और गिरता भूजल अब जनता के लिए जी का जंजाल बन गया है।
गढ़वा जिला अपनी भौगोलिक स्थिति और खनिज संपदा के लिए जाना जाता है। यहाँ का काला पत्थर (Black Stone) पूरे देश में मशहूर है। लेकिन क्या यह 'विकास' केवल मुनाफे तक सीमित है? एनआर डेली न्यूज़ की विशेष आर्थिक और पर्यावरणीय रिपोर्ट में आज हम खदानों के अंदर की हकीकत और उनके बाहर के प्रभाव का विश्लेषण करेंगे।
आर्थिक पक्ष:
पत्थर खनन से जिले को सालाना करोड़ों रुपये का राजस्व (Royalty) प्राप्त होता है। यहाँ की खदानों और क्रशरों में करीब 20 हजार लोग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए हैं। सड़कों के निर्माण और कंस्ट्रक्शन बिज़नेस में तेजी आने से यहाँ के पत्थरों की मांग बिहार और उत्तर प्रदेश में बहुत ज़्यादा है। स्थानीय ट्रक मालिकों और मज़दूरों के लिए यह रोज़गार का सबसे बड़ा साधन है।
पर्यावरण पर चोट:
खनन के इस चमकते सिक्के का दूसरा पहलू बहुत काला है। मंझिआंव क्षेत्र के मकरो और डूमर के पास स्थित गांव अब 'सफेद' हो गए हैं। क्रशरों से उड़ने वाली धूल (Silica Dust) ने लोगों के फेफड़ों को छलनी कर दिया है। खेती की ज़मीन पथरीली हो गई है और पेड़-पौधे सूख रहे हैं। जल स्तर इतना नीचे जा चुका है कि गर्मियों में खदानों के आसपास के हैंडपंपों से पानी की जगह केवल आवाज़ आती है।
नियमों की धज्जियां:
खनन नियमों के अनुसार, क्रशरों के चारों तरफ ग्रीन बेल्ट बनाना और धूल रोकने के लिए फव्वारे (Sprinklers) लगाना अनिवार्य है। लेकिन कागजों पर चलने वाला यह नियम ज़मीन पर कहीं नहीं दिखता। खदानों में होने वाले ब्लास्टिंग (Blasting) से स्थानीय घरों में दरारें आ रही हैं। मज़दूर सुरक्षा उपकरणों (Safety Gear) के बिना काम करने को मजबूर हैं, जिससे आए दिन हादसों का खतरा बना रहता है।
प्रशासन की भूमिका:
खनन विभाग ने पिछले हफ्ते कई खदानों का निरीक्षण किया और जुर्माने भी लगाए, लेकिन 'पेनल्टी' देना खदान मालिकों के लिए अब व्यापार का हिस्सा बन गया है। भ्रष्टाचार की दीमक ने पूरे सिस्टम को खोखला कर दिया है। लोग अब सामूहिक रूप से एनजीटी (National Green Territory) में शिकायत करने की योजना बना रहे हैं।
निष्कर्ष:
हमें विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना होगा। अगर आज हम केवल मुनाफे के पीछे भागेंगे, तो आने वाली पीढ़ियों के पास केवल धूल और बंजर ज़मीन रह जाएगी। एनआर डेली न्यूज़ की टीम मांग करती है कि जिले में 'साइंटिफिक माइनिंग' को बढ़ावा दिया जाए और प्रभावित क्षेत्रों में सघन पौधारोपण अभियान चलाया जाए।
