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गढ़वा से बड़े शहरों का पलायन: खाली होते गांव और परिवारों की दर्दनाक कहानियां

रविवार, 12 अप्रैल 2026
garhwa
By NR Desk

पलायन गढ़वा जिले की नियति बन चुका है। रोज़गार की तलाश में सूरत, दिल्ली और बेंगलुरु जाने वाले युवाओं की संख्या रिकॉर्ड स्तर पर है। स्थानीय उद्योग न होना और सरकारी योजनाओं की विफलता ने गाँव के गाँव केवल बुजुर्गों और बच्चों के हवाले छोड़ दिए हैं।

गढ़वा जिले के सुदूर गांवों में शाम होते ही सन्नाटा पसर जाता है। इसका कारण केवल बिजली की कमी नहीं, बल्कि वो खाली घर हैं जिनके चिराग हज़ारों मील दूर फैक्ट्रियों में काम कर रहे हैं। पलायन झारखंड के इस जिले की सबसे बड़ी सामाजिक और आर्थिक समस्या बन गई है। एनआर डेली न्यूज़ की टीम ने डंडई, मझिआंव और धुरकी के उन इलाकों का दौरा किया जहां हर दूसरे घर का सदस्य बाहर काम कर रहा है।

क्यों भाग रहे हैं युवा?
जिले में किसी भी बड़े उद्योग का न होना और खेती का अनिश्चित होना मुख्य वजह है। सरकारी नौकरियों की प्रक्रिया इतनी धीमी है कि युवा तीन-चार साल इंतज़ार करने के बाद थक जाते हैं। "यहाँ 200 रुपये की दिहाड़ी मिलना भी मुश्किल है, जबकि सूरत की टेक्सटाइल मिल में हमें 12-15 हजार रुपये महीने के मिल जाते हैं। मजबूरी है साहब, परिवार पालना है तो बाहर जाना ही होगा," धुरकी के रहने वाले 22 वर्षीय साजिद बताते हैं।

टूटे हुए परिवारों की व्यथा:
पलायन के कारण सामाजिक ढांचा चरमरा रहा है। बच्चे अपने पिता के साये के बिना बड़े हो रहे हैं और बुजुर्गों की देखभाल करने वाला कोई नहीं है। कई बार दुर्घटनाओं में बाहर गए मज़दूरों की जान चली जाती है और उनका शव भी गांव नहीं पहुँच पाता। "मेरा बेटा दिवाली पर आने वाला था, लेकिन वहाँ बॉयलर फटने से उसकी मौत हो गई। अब इस बुढ़ापे में मैं किसे पुकारूँ?"—यह दर्द भरी आवाज़ 70 वर्षीय बिरजू महतो की है।

सरकारी योजनाओं का हश्र:
मनरेगा (MGNREGA) जैसी योजनाएँ भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुकी हैं। मज़दूरों का कहना है कि काम मिलता भी है तो पैसे तीन-तीन महीने बाद आते हैं। जेएसएलपीएस (JSLPS) की स्किल ट्रेनिंग भी केवल कागजों तक सीमित है। ज़मीनी स्तर पर लघु उद्योगों या स्वरोज़गार के लिए कोई ठोस ईकोसिस्टम मौजूद नहीं है।

भविष्य का संकट:
अगर पलायन इसी रफ्तार से चलता रहा, तो जिले में केवल उत्पादक शक्ति खत्म हो जाएगी। स्किल लेबर का अभाव क्षेत्र के विकास को पूरी तरह से रोक देगा। बुद्धिजीवियों का मानना है कि कृषि आधारित उद्योगों (Agro-based Industries) की स्थापना ही एकमात्र समाधान है।

निष्कर्ष:
पलायन केवल एक सांख्यिकीय आंकड़ा नहीं है, यह एक मानवीय संकट है। एनआर डेली न्यूज़ प्रशासन से सवाल पूछता है कि कब तक हमारे जिले के युवा दूसरों के शहरों को बनाने के लिए अपनी जवानी खपाते रहेंगे? क्या हमें अपने ही घर में सम्मानजनक रोज़गार का हक नहीं है? सरकार को अब दावों से हटकर ज़मीनी उद्योगों पर काम करना ही होगा।

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NR Bureau is a senior intelligence correspondent for NR Global Agency, specializing in regional geopolitical developments and sociopolitical analysis.

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