गढ़वा जिले में जेनेरिक दवाओं की स्वीकार्यता तेज़ी से बढ़ रही है। ब्रांडेड दवाओं के मुकाबले 80% तक सस्ती दवाइयाँ अब गरीबों के लिए जीवन रक्षक साबित हो रही हैं। एक विशेष स्वास्थ्य-आर्थिक रिपोर्ट।
दवाइयों का बढ़ता खर्च मध्यम और निम्न वर्गीय परिवारों के लिए एक बड़ा संकट रहा है। लेकिन गढ़वा जिले में पिछले दो वर्षों में 'प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि परियोजना' ने इस तस्वीर को बदला है। जिले के विभिन्न शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में खुले जन औषधि केंद्रों ने महंगे इलाज को किफायती बना दिया है। एनआर डेली न्यूज़ की रिपोर्ट में आज हम जानेंगे कैसे जेनेरिक दवाएं लोगों की पहली पसंद बन रही हैं।
किफायती और असरदार:
लोगों के बीच पहले यह भ्रम था कि 'सस्ती दवा मतलब खराब दवा'। लेकिन जागरूकता अभियान और डॉक्टरों की सलाह ने इस सोच को बदल दिया है। एक आम नागरिक सुरेश गुप्ता बताते हैं, "मेरी ब्लड प्रेशर की दवा पहले 600 रुपये महीने की आती थी, अब जन औषधि केंद्र से वही दवा केवल 150 रुपये में मिल जाती है। इससे मेरे घर के राशन का बजट सुधर गया है।" गुणवत्ता के मामले में ये दवाएं किसी भी ब्रांडेड कंपनी के बराबर हैं क्योंकि इनकी टेस्टिंग 'एनएबीएल' लैब में होती है।
बढ़ता नेटवर्क:
गढ़वा शहर के सदर अस्पताल के पास से लेकर रंका और मंझिआंव जैसे प्रखंडों तक अब ये केंद्र खुल चुके हैं। वर्तमान में जिले में 15 से अधिक सक्रिय केंद्र हैं। यहाँ न केवल दवाएं, बल्कि सेनेटरी पैड्स, बेबी फूड और मेडिकल उपकरण भी रियायती दरों पर उपलब्ध हैं। युवाओं के लिए यह रोज़गार का भी एक अच्छा अवसर साबित हो रहा है, क्योंकि फार्मासिस्ट अपनी खुद की दुकान खोलकर अच्छी कमाई कर रहे हैं।
चुनौतियां और बाज़ार का विरोध:
सफलता के बावजूद, कई निजी डॉक्टर और केमिस्ट आज भी जेनेरिक दवाओं के बजाय कमीशन के लालच में ब्रांडेड दवाएं लिखते हैं। ग्रामीण मरीज़ों को बहकाया जाता है कि 'सरकारी दवा' धीरे काम करती है। सरकार को चाहिए कि वह डॉक्टरों के लिए 'जेनेरिक प्रिस्क्रिप्शन' अनिवार्य करे। साथ ही, कई बार इन केंद्रों पर 'स्टॉक' की कमी हो जाती है, जिसे सप्लाई चेन सुधारकर दूर किया जा सकता है।
भविष्य की संभावनाएं:
प्रशासन की योजना है कि हर पंचायत स्तर पर कम से कम एक जन औषधि केंद्र खोला जाए। इससे सुदूर इलाकों के गरीबों को मामूली बीमारियों के लिए रंका या गढ़वा नहीं भागना पड़ेगा। डिजिटल माध्यमों से अब इन दवाओं की उपलब्धता भी चेक की जा सकती है।
निष्कर्ष:
स्वास्थ्य व्यवस्था का उद्देश्य मुनाफा नहीं, बल्कि सेवा होना चाहिए। जन औषधि केंद्र इसी दिशा में एक सफल कदम है। एनआर डेली न्यूज़ पाठकों से अपील करता है कि वे ब्रांड के नाम पर न जाकर साल्ट (Salt) के नाम पर दवाएं खरीदें और अपनी मेहनत की कमाई बचाएं। स्वस्थ गढ़वा ही समर्थ गढ़वा बनेगा।
