पलामू प्रक्षेत्र की शान माने जाने वाली 'झुमइर' नृत्य और संगीत की परंपरा अब लुप्त होने की कगार पर है। नई पीढ़ी इसे भूल रही है और पुराने कलाकार गरीबी में जीवन बिता रहे हैं। इस अनमोल धरोहर को बचाने की एक पुकार।
गढ़वा और पलामू की माटी में बसा 'झुमइर' केवल एक नृत्य नहीं, बल्कि यहाँ के जनजीवन की आत्मा है। मांदर की थाप पर थिरकते पैर और लोक गीतों की तान में झारखंड का इतिहास गूंजता है। लेकिन दुख की बात यह है कि आधुनिक डीजे और सोशल मीडिया के शोर में यह मधुर झुमइर अब सुनाई नहीं देती। एनआर डेली न्यूज़ की विशेष सांस्कृतिक रिपोर्ट।
क्या है झुमइर?
झुमइर मुख्य रूप से कृषि उत्सवों, शादियों और पर्व-त्योहारों पर किया जाने वाला सामूहिक नृत्य है। इसमें प्रकृति से लगाव, प्रेम और संघर्ष की कहानियों को गीतों के माध्यम से पिरोया जाता है। इसके वाद्य यंत्र—मांदर, नगाड़ा और झांझ—विशुद्ध रूप से मिट्टी और लकड़ी से बने होते हैं। पुराने कलाकारों का कहना है कि झुमइर करने से मन को जो शांति मिलती है, वह किसी और संगीत में नहीं।
कलाकारों की बदहाली:
आज झुमइर के मंझे हुए कलाकार दिहाड़ी मज़दूरी करने को मजबूर हैं। 75 वर्षीय कलाकार रामवृक्ष उरांव बताते हैं, "पहले हमें दूर-दूर से बुलाया जाता था, सम्मान मिलता था। अब लोग शोर-शराबा पसंद करते हैं। हमारे मांदर की आवाज़ अब किसी को अच्छी नहीं लगती।" सरकार की ओर से कलाकारों को मिलने वाली पेंशन या सहायता अपर्याप्त है। कई वाद्य यंत्र बनाने वाले कारीगरों ने अब अपना पुश्तैनी काम छोड़ दिया है।
भविष्य का संकट:
नई पीढ़ी पाश्चात्य संस्कृति और बॉलीवुड गानों की चकाचौंध में इस विरासत से कट रही है। स्कूलों में लोक कला को लेकर कोई विशेष पाठ्यक्रम या प्रोत्साहन नहीं है। हालांकि, कुछ युवाओं ने 'यूट्यूब' और अन्य प्लेटफॉर्म्स के ज़रिए झुमइर को नया रूप (Fusion) देने की कोशिश की है, लेकिन पारंपरिक शुद्धता खोती जा रही है।
संरक्षण के प्रयास:
ज़रूरत है कि ज़िला प्रशासन और कला-संस्कृति विभाग 'लोक कला महोत्सव' नियमित रूप से आयोजित करे। कलाकारों को रिकॉर्डिंग के अवसर दिए जाएं और उन्हें स्कूलों में प्रशिक्षक के रूप में नियुक्त किया जाए। "हमें झुमइर को म्यूज़ियम में नहीं, बल्कि लोगों के दिलों में ज़िंदा रखना होगा," एक सांस्कृतिक कार्यकर्ता का कहना है।
निष्कर्ष:
संस्कृति किसी भी समाज की पहचान होती है। अगर झुमइर खत्म हुआ, तो गढ़वा अपनी पहचान का एक प्रमुख हिस्सा खो देगा। एनआर डेली न्यूज़ सांस्कृतिक प्रेमियों से अपील करता है कि वे अपनी इन जड़ों की महक को सहेजें। हमारी पुरानी कला और वाद्य यंत्र हमारे गर्व के प्रतीक हैं। आइए, फिर से मांदर की थाप पर थिरकना शुरू करें और अपनी विरासत को अमर बनाएं।
