गढ़वा जिले का नगर उंटारी, जो अब 'बंशीधर नगर' के नाम से जाना जाता है, अपनी अद्वितीय 32 मन की ठोस सोने वाली कृष्ण प्रतिमा के लिए विश्व प्रसिद्ध है। जानिए इस मंदिर का इतिहास और क्षेत्र के विकास में इसका योगदान।
गढ़वा जिले के पश्चिमी छोर पर स्थित नगर उंटारी (बंशीधर नगर) न केवल एक धार्मिक स्थल है, बल्कि यह उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड के संगम का सांस्कृतिक केंद्र भी है। यहाँ स्थापित भगवान कृष्ण की 32 मन (करीब 1280 किलो) शुद्ध सोने की प्रतिमा पर्यटकों और श्रद्धालुओं को विस्मित कर देती है। एनआर डेली न्यूज़ की विशेष सांस्कृतिक रिपोर्ट में आज हम इस विरासत की गहराई में उतरेंगे।
इतिहास की झलक:
इस मंदिर का इतिहास करीब 250 वर्ष पुराना है। कहा जाता है कि उंटारी रियासत की महारानी शिवमानी कुंवर के स्वप्न में भगवान कृष्ण आए थे और उन्होंने अपनी प्रतिमा के बारे में बताया था। शिवानी कुंवर ने उसी स्वप्न के आधार पर कनहर नदी के समीप शिवपहाड़ी की खुदाई करवाई, जहां से यह अद्भुत प्रतिमा प्राप्त हुई। उसके बाद 1885 में इस विशाल मंदिर का निर्माण शुरू हुआ। आज यह मंदिर वैष्णव धर्म का एक प्रमुख स्तंभ माना जाता है।
पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था:
बंशीधर मंदिर न केवल आस्था का केंद्र है, बल्कि यह नगर उंटारी की पूरी अर्थव्यवस्था की धड़कन भी है। मंदिर के आसपास के बाज़ारों में सालाना करोड़ों का कारोबार होता है। पूजा सामग्री, होटल, परिवहन और हस्तशिल्प से जुड़े हज़ारों परिवारों की जीविका सीधे तौर पर यहाँ आने वाले हज़ारों श्रद्धालुओं पर निर्भर है। पर्यटन विभाग ने इसे 'सांस्कृतिक सर्किट' में शामिल किया है, जिससे क्षेत्र में बुनियादी ढांचे का विकास तेज़ हुआ है।
सांस्कृतिक महोत्सव:
हर साल जन्माष्टमी और फाल्गुन के उत्सव पर यहाँ भव्य मेलों का आयोजन होता है। इन मौकों पर देशभर से कलाकार अपनी प्रस्तुति देने आते हैं। हालाँकि, स्थानीय लोगों का मानना है कि इस पर्यटन स्थल को खजुराहो या काशी की तर्ज पर और अधिक विकसित किया जा सकता है। "हमारी मांग है कि यहाँ एक भव्य म्यूज़ियम बने, जहां उंटारी रियासत और मंदिर से जुड़ी प्राचीन वस्तुओं को सहेजा जा सके," स्थानीय व्यवसायी नीरज गुप्ता बताते हैं।
संरक्षण और भविष्य की चुनौतियां:
बढ़ती भीड़ और सुरक्षा की दृष्टि से मंदिर परिसर का विस्तार ज़रूरी हो गया है। हाल के दिनों में प्रतिमा की सुरक्षा को लेकर विशेष सेंसर और पुलिस पिकेट की व्यवस्था की गई है। सरकार यहाँ रेल और सड़क मार्ग को और सुगम बनाने पर काम कर रही है ताकि दक्षिण भारत और पूर्वोत्तर से भी श्रद्धालु आ सकें।
निष्कर्ष:
बंशीधर मंदिर केवल गढ़वा का गौरव नहीं है, बल्कि यह झारखंड की उस समृद्ध विरासत का प्रतीक है जो हमें गर्व का अहसास कराती है। हमें अपनी इस अनमोल धरोहर को संजोना है और इसका ऐसा प्रचार करना है कि यह विश्व पर्यटन के मानचित्र पर और भी चमक सके। एनआर डेली न्यूज़ की टीम आपसे आग्रह करती है कि आप भी एक बार नगर उंटारी की इस जादुई सुंदरता का दर्शन ज़रूर करें।
