गढ़वा के मेराल प्रखंड के रहने वाले मोहन सिंह ने अपनी 5 एकड़ बंजर भूमि को जैविक खेती के ज़रिए लहलहाते बाग में बदल दिया है। आज वे सलाना 15 लाख रुपये का मुनाफा कमा रहे हैं और पूरे जिले के युवाओं के लिए प्रेरणा स्रोत बन गए हैं।
गढ़वा जिले के मेराल प्रखंड का एक छोटा सा गांव, जहां कभी पानी की कमी और पथरीली ज़मीन के कारण खेती करना असंभव माना जाता था, आज वहां मोहन सिंह की मेहनत की खुशबू महक रही है। मोहन सिंह (42) ने वह कर दिखाया जो बड़े-बड़े कृषि विशेषज्ञ भी नहीं कर पाए। उन्होंने अपनी 5 एकड़ की वह ज़मीन, जिसे उनके परिवार ने 'बेकार' मानकर छोड़ दिया था, उसे जैविक खेती (Organic Farming) के दम पर एक सफल बिज़नेस मॉडल बना दिया है।
संघर्ष की शुरुआत:
मोहन बताते हैं कि 5 साल पहले जब उन्होंने नौकरी छोड़कर खेती करने का फैसला लिया, तो सबने उनका मज़ाक उड़ाया था। "ज़मीन ऐसी थी कि घास भी नहीं उगती थी," मोहन याद करते हुए कहते हैं। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने रांची के कृषि विश्वविद्यालय से प्रशिक्षण लिया और पारंपरिक खाद की जगह खुद घर पर 'जीवामृत' और 'वर्मी कंपोस्ट' बनाना शुरू किया।
जैविक खेती का मॉडल:
मोहन ने परंपरागत धान-गेहूं की खेती छोड़कर एकीकृत कृषि (Integrated Farming) मॉडल अपनाया। उन्होंने अपनी ज़मीन के एक हिस्से में आम और नींबू के बाग लगाए, तो दूसरे हिस्से में बेमौसमी सब्जियां जैसे ब्रोकली, शिमला मिर्च और रंगीन गोभी उगाना शुरू किया। उन्होंने पूरी तरह से गोबर खाद और नीम के तेल का उपयोग किया, जिससे उनकी लागत 40% तक कम हो गई और पैदावार की गुणवत्ता ऐसी हुई कि उसे बाहर के बाज़ारों में दोगुने दाम मिलने लगे।
ड्रिप इरिगेशन और जल संरक्षण:
गढ़वा जैसे सूखा प्रभावित इलाके में खेती के लिए पानी सबसे बड़ी चुनौती थी। इसके लिए मोहन ने प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना का लाभ उठाया और पूरे खेत में 'ड्रिप इरिगेशन' (टपक सिंचाई) सिस्टम लगवाया। इससे न केवल पानी की बचत हुई, बल्कि पौधों को सही मात्रा में नमी भी मिलने लगी। आज उनके खेत में एक छोटा तालाब भी है, जिसमें वे मछली पालन कर अतिरिक्त आय कमाते हैं।
कमाई और बाज़ार का विस्तार:
आज मोहन सिंह के खेत से निकलने वाली सब्जियां केवल गढ़वा ही नहीं, बल्कि डाल्टेनगंज और रांची के प्रीमियम स्टोर्स तक जाती हैं। उनका सालाना टर्नओवर 15 लाख रुपये से अधिक का है। वे कहते हैं, "अगर युवा तकनीक और मेहनत को मिला दें, तो खेती से बेहतर कोई पेशा नहीं है।" अब वे अपने गांव के अन्य 50 युवाओं को भी इसकी ट्रेनिंग दे रहे हैं।
विशेष रिपोर्ट और सुझाव:
सरकार की सब्सिडी योजनाओं का सही उपयोग और ज़मीन की मिट्टी का परीक्षण किसी भी किसान की किस्मत बदल सकता है। मोहन सिंह की यह कहानी साबित करती है कि इच्छाशक्ति के आगे संसाधन कम नहीं पड़ते। एनआर डेली न्यूज़ मेराल के इस 'धरती पुत्र' को सलाम करता है और उम्मीद करता है कि ज़िले के अन्य किसान भी इस मार्ग को अपनाकर स्वावलंबी बनेंगे।
