गढ़वा जिले के शहरी और ग्रामीण इलाकों में सिंथेटिक ड्रग्स और अवैध कफ सिरप का कारोबार तेज़ी से पैर पसार रहा है। पुलिस ने स्कूलों के आसपास सघन चेकिंग अभियान शुरू किया है, लेकिन नशे के सौदागर नए-नए तरीके अपना रहे हैं।
गढ़वा की नई पीढ़ी आज एक ऐसे जाल में फंस रही है जो न केवल उनके भविष्य बल्कि उनके जीवन को भी खत्म कर रहा है। पिछले दो वर्षों में जिले में नशीले पदार्थों के सेवन के मामलों में 30% की अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि 14 से 18 साल के किशोर इसके सबसे बड़े शिकार बन रहे हैं। एनआर डेली न्यूज़ की विशेष खोजी रिपोर्ट में आज हम 'नशे के स्याह बाज़ार' का पर्दाफाश करेंगे।
सौदागरों का नेटवर्क:
शहर के मुख्य चौराहों और गली-कूचों में अब प्रतिबंधित कफ सिरप, कोडीन और नशीली गोलियाँ आसानी से उपलब्ध हो रही हैं। पुलिस की जांच में यह बात सामने आई है कि ये पदार्थ पड़ोसी राज्यों से अवैध तरीके से मंगाए जाते हैं। मेडिकल स्टोरों की आड़ में नशीली दवाइयों का एक बड़ा सिंडिकेट काम कर रहा है। पुलिस कप्तान ने हाल ही में बताया कि कई पान की दुकानों और छोटे जनरल स्टोर्स से भी पुड़िया के रूप में नशा बेंचा जा रहा है।
स्कूल और कॉलेज टारगेट:
नशे के सौदागरों ने अब शिक्षण संस्थानों को अपना अड्डा बना लिया है। लुभावने पैक और 'एनर्जी बूस्टर' के नाम पर छात्रों को पहले इनकी लत लगाई जाती है और फिर उन्हें डिलीवरी एजेंट के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। एक शिक्षक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, "छात्रों के व्यवहार में अचानक आ रहा बदलाव—गुस्सैल स्वभाव, आँखों का लाल रहना और पढ़ाई से दूरी—नशे का संकेत है।"
पुलिस की कार्रवाई:
गढ़वा पुलिस ने 'ऑपरेशन क्लीन' के तहत पिछले एक महीने में 20 से अधिक ठिकानों पर छापेमारी की है। लाखों रुपये के नशीले पदार्थ जब्त किए गए हैं और 10 लोगों को जेल भेजा गया है। लेकिन चुनौती यह है कि जैसे ही एक सिंडिकेट टूटता है, दूसरा तैयार हो जाता है। पुलिस अब 'सोशल पुलिसिंग' के ज़रिए मोहल्लों में कमेटियां बना रही है ताकि अवैध गतिविधियों की तुरंत सूचना मिल सके।
पुनर्वास केंद्रों की कमी:
लत छुड़ाने के लिए जिले में एक भी सरकारी नशा मुक्ति केंद्र (Rehabilitation Center) नहीं है। निजी केंद्र इतने महंगे हैं कि गरीब परिवार वहाँ अपने बच्चों को भर्ती नहीं करा पाते। सरकारी अस्पताल में केवल साधारण इलाज होता है, जबकि नशे के मरीज़ों को मनोवैज्ञानिक मदद और निरंतर काउंसलिंग की ज़रूरत होती है।
निष्कर्ष:
नशा एक सामाजिक बुराई है जिसे केवल कानून से खत्म नहीं किया जा सकता। इसके लिए माता-पिता, शिक्षकों और समाज के हर वर्ग को जागरूक होना होगा। जब तक मांग (Demand) खत्म नहीं होगी, सप्लाई बंद करना मुश्किल है। एनआर डेली न्यूज़ अभिभावकों से अपील करता है कि वे अपने बच्चों के व्यवहार पर नज़र रखें और 'नशा मुक्त गढ़वा' के संकल्प में प्रशासन का साथ दें।
