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सुदूरवर्ती क्षेत्रों में कुपोषण का दंश: आदिवासी महिलाओं और बच्चों में एनिमिया का गहराता संकट

रविवार, 12 अप्रैल 2026
garhwa
By NR Desk

झारखंड सरकार के तमाम पौष्टिक आहार कार्यक्रमों के बावजूद गढ़वा के भंडरिया और बड़गड़ प्रखंडों में कुपोषण का स्तर डराने वाला है। एनिमिया (खून की कमी) के कारण प्रसव के दौरान महिलाओं की जान पर बन आती है। एक स्वास्थ्य रिपोर्ट।

गढ़वा जिले के घने जंगलों के बीच बसे आदिवासी टोलों में आज भी भूख और बीमारी का साया मंडरा रहा है। कहने को तो सरकार 'आंगनबाड़ी' केंद्रों के माध्यम से पोषाहार बांट रही है, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि यहाँ की 60% से अधिक महिलाएं और बच्चे गंभीर एनिमिया (खून की कमी) से ग्रसित हैं। एनआर डेली न्यूज़ की स्वास्थ्य टीम ने भंडरिया प्रखंड के आधा दर्जन गांवों का दौरा किया, जहां स्थिति चिंताजनक मिली।

एनिमिया का भयावह रूप:
पड़ताल के दौरान पाया गया कि कई गर्भवती महिलाओं का हीमोग्लोबिन स्तर 7 से कम है, जबकि सामान्य रूप से यह 11-12 होना चाहिए। कुपोषण के कारण बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास रुक गया है। स्थानीय स्वास्थ्य कार्यकर्ता बताती हैं, "यहाँ के लोग अपनी पारंपरिक डाइट (मड़ुआ, जड़ी-बूटियाँ) से दूर हो गए हैं और सरकारी चावल पर निर्भर हैं, जिसमें पोषण की कमी है। गरीबी इतनी है कि वे फल और दूध खरीदने के बारे में सोच भी नहीं सकते।"

आंगनबाड़ी केंद्रों की विफलता:
जांच में खुलासा हुआ कि कई आंगनबाड़ी केंद्र केवल कागजों पर चल रहे हैं। पोषाहार वितरण में अनियमितता और दाल-चावल की घटिया गुणवत्ता प्रमुख समस्या है। बच्चों को मिलने वाला अंडा और फल अक्सर बिचौलियों की भेंट चढ़ जाता है। कई केंद्रों पर तो बिजली और साफ़ पानी तक की व्यवस्था नहीं है, जिससे स्वच्छता के मानक पूरे नहीं हो पाते।

जागरूकता का अभाव:
शिक्षा की कमी के कारण ग्रामीण आज भी कुपोषण को 'दैवीय प्रकोप' या 'जादू-टोना' मानते हैं। वे अस्पताल जाने के बजाय झाड़-फूँक का सहारा लेते हैं। जब तक स्थिति बेकाबू नहीं हो जाती, वे डॉक्टर के पास नहीं पहुँचते। स्वास्थ्य विभाग के मोबाइल मेडिकल वैन इन दुर्गम रास्तों पर साल में केवल एक या दो बार ही पहुँच पाते हैं।

सरकारी प्रयास और समाधान:
सिविल सर्जन ने स्वीकार किया है कि सुदूर क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच एक बड़ी चुनौती है। उन्होंने कहा कि "हम 'डाक' (Direct Action against Anemia and Malnutrition) अभियान के तहत विशेष कैंप लगा रहे हैं और आयरन की गोलियां मुफ्त बांट रहे हैं।" लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि केवल गोलियां बांटने से काम नहीं चलेगा, जब तक कि ग्रामीणों को स्थायी रोज़गार और संतुलित आहार न मिले।

निष्कर्ष:
कुपोषण को हराने के लिए केवल योजनाओं का नाम बदलना काफी नहीं है, बल्कि वितरण प्रणाली को पारदर्शी बनाना होगा। एनआर डेली न्यूज़ मुख्यमंत्री से अपील करता है कि वे कुपोषण मुक्त झारखंड के संकल्प को ज़मीनी स्तर पर सख्ती से लागू करें। हमारे भविष्य (बच्चों) को वेंटिलेटर से बाहर निकालना ही सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए। स्वास्थ्य ही असली संपत्ति है।

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NR Bureau is a senior intelligence correspondent for NR Global Agency, specializing in regional geopolitical developments and sociopolitical analysis.

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