गढ़वा जिले की 100 से अधिक महिलाओं ने अपनी किस्मत खुद लिखी है। 'सखी मंडल' के ज़रिए सोलर लैंप असेंबलिंग का काम शुरू कर न केवल वे आर्थिक रूप से स्वतंत्र हुई हैं, बल्कि जिले के विद्युतीकरण में भी हाथ बंटा रही हैं।
झारखंड के गढ़वा जैसे पिछड़ी श्रेणी में गिने जाने वाले जिले की महिलाओं ने यह साबित कर दिया है कि अगर उन्हें सही अवसर मिले, तो वे तकनीक के क्षेत्र में भी कमाल कर सकती हैं। जेएसएलपीएस (JSLPS) के माध्यम से गठित 'उज्ज्वला स्वयं सहायता समूह' की महिलाओं ने सोलर तकनीक को अपना रोज़गार बनाया है। एनआर डेली न्यूज़ की प्रेरणादायक रिपोर्ट में आज हम इन 'सोलर दीदियों' की कहानी सुनाएंगे।
कैसे हुई शुरुआत?
दो साल पहले प्रशासन ने इन महिलाओं को सोलर लैंप, टॉर्च और छोटे होम लाइटिंग सिस्टम असेंबल करने की ट्रेनिंग दी थी। शुरुआती दौर में महिलाओं को तकनीक समझने में दिक्कत हुई, लेकिन उनकी सीखने की ललक ने उन्हें पारंगत बना दिया। आज वे सर्किट जोड़ने से लेकर सोलर पैनल की टेस्टिंग तक का काम खुद करती हैं।
आर्थिक स्वावलंबन:
इन महिलाओं की आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। पहले जो महिला केवल खेती या मज़दूरी करती थी और महीने में 2-3 हजार रुपये भी नहीं कमा पाती थी, वह आज सोलर यूनिट चलाकर 10 से 15 हजार रुपये महीने कमा रही है। "पहले हमें 10 रुपये के लिए भी पति से मांगना पड़ता था, लेकिन आज हम खुद घर का खर्च उठाते हैं और बच्चों को अच्छे स्कूल में भेज रहे हैं," समूह की सदस्य सीमा देवी गर्व से कहती हैं।
अंधेरे गांवों का उजाला:
इन महिलाओं द्वारा बनाए गए सोलर लैंप उन गांवों में पहुँच रहे हैं जहां आज भी बिजली की ग्रिड नहीं पहुँची है। किफायती दर और ड्यूरेबिलिटी के कारण स्थानीय लोग इन लैंपों को काफी पसंद कर रहे हैं। अब आसपास के जिलों जैसे पलामू और लातेहार से भी इनके पास ऑर्डर आने लगे हैं। वे न केवल निर्माण कर रही हैं, बल्कि रिपेयरिंग सेंटर भी चला रही हैं।
चुनौतियां और संभावनाएं:
सफलता के बावजूद, इन महिलाओं को कच्चे माल (Raw Materials) की समय पर आपूर्ति और बड़े बाज़ारों तक पहुँच बनाने में दिक्कत आती है। अगर सरकार इन्हें बड़े प्रोजेक्ट्स में भागीदार बनाए, तो यह मॉडल पूरे प्रदेश के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकता है। डीसी ने भरोसा जताया है कि सरकारी कार्यालयों में भी इन्हीं समूहों द्वारा निर्मित सोलर उपकरणों का उपयोग बढ़ाया जाएगा।
निष्कर्ष:
गढ़वा की ये महिलाएं केवल सोलर लैंप नहीं बना रही हैं, वे अपनी और अपने समाज की नई तक़दीर लिख रही हैं। महिला सशक्तिकरण का इससे बेहतर उदाहरण और कोई नहीं हो सकता। एनआर डेली न्यूज़ इन 'चमकती महिलाओं' को सलाम करता है और ज़िले के अन्य युवाओं से आग्रह करता है कि वे भी कौशलयुक्त बनकर स्वावलंबी बनें।
