रामना से विशेष रिपोर्ट

दिनांक: 19 जून 2026

झारखंड के रामना से एक ऐसी प्रेम कहानी सामने आई है जो समाज की दोहरी मानसिकता और जातिगत पाखंड को बेनकाब करती है। स्नेहा और रुपेश ने चार साल तक एक-दूसरे के लिए प्रेम, समर्पण और पूजा-पाठ किया। दोनों ने एक-दूसरे के लिए जान देने की भी कोशिश की, लेकिन इसी समाज को किसी की जान से ज्यादा अपनी “जाति” प्यारी है।

19 मई को जब स्नेहा ने रुपेश को अपने पैरों पर चलते हुए आते देखा तो वह खुशी से रो पड़ी। बताया जा रहा है कि परीक्षा के दौरान रुपेश एक बड़े हादसे का शिकार होते-होते बचा था और उसके बाद पहली बार वह चलकर स्नेहा से मिलने पहुँचा था। स्नेहा की आँखों में उस दिन जो आँसू थे, वे प्रेम और ईश्वर के प्रति आभार के थे। लेकिन आज उन्हीं आँखों में बेबसी है, क्योंकि अब चोरी-छिपे स्नेहा की शादी कहीं और तय की जा रही है और पूरा समाज मुँह देखता खड़ा है।

ग्रामीणों और करीबी सूत्रों का कहना है कि स्नेहा और रुपेश ने कभी समाज से छिपकर कुछ गलत नहीं किया। दोनों का प्रेम किसी से छिपा नहीं है। लेकिन यहीं पर समाज का दोहरा रवैया सामने आता है – अगर यही लड़का-लड़की किसी गलत काम में पकड़े जाते तो गाँव-समाज तुरंत पकड़कर शादी करवा देता। उस समय कोई जाति नहीं पूछता। लेकिन जब दो प्रेमी खुलेआम एक-दूसरे के प्रति ईमानदार हैं, तब सारा समाज आँख पर जाति की पट्टी बाँधे खड़ा है।

“यह समाज शिव-पार्वती की पूजा करता है, जिन्होंने स्वयं प्रेम विवाह किया था, लेकिन आज जब एक बेटी अपने जीवनसाथी के रूप में किसी दूसरी जाति के युवक को पसंद करती है तो माता-पिता को अपनी इज्जत और समाज की मर्यादा ही दिखाई देती है। बेटी खुश है या नहीं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता,” स्थानीय लोग बताते हैं।

आज स्थिति यह है कि स्नेहा के चरित्र, उसकी पवित्रता और उसकी इज्जत पर उँगलियाँ उठ रही हैं। लेकिन जो लोग आज चुप हैं, कल अगर लड़की या लड़के ने कोई गलत कदम उठा लिया तो जिम्मेदार कौन होगा? क्या वे माता-पिता जिन्हें सिर्फ अपनी खुशी और अपनी जाति की इज्जत दिखती है? स्नेहा और रुपेश के समर्थकों का कहना है कि अगर समय रहते समाज ने अपनी आँखें खोलीं तो ही दो जिंदगियाँ बच सकती हैं, वरना यह “रामना का न्याय” एक और प्रेम कहानी को त्रासदी में बदल देगा。

क्या समाज वाकई जाति को प्रेम और इंसानियत से ऊपर रखेगा? फिलहाल स्नेहा की आँखों में केवल उस चार साल के प्यार की तस्वीर बसी है और रुपेश के हौसले ने अभी हार नहीं मानी है। लेकिन जिस दिन यह चुप्पी टूटेगी, उस दिन इसके जिम्मेदार सिर्फ वे लोग होंगे जिन्होंने आज मुँह फेर लिया।