रामना से विशेष टिप्पणी

रामना की वह मिट्टी, जहाँ एक लड़की ने अपनी हथेलियों में भरकर चार साल प्रेम को सींचा, आज उसी हथेली से सबकुछ फिसलता जा रहा है। स्नेहा की आँखों में उस लड़के के लिए इतना प्यार था कि उसने मंदिरों की सीढ़ियाँ अपनी जगह से हटा दीं और स्वयं भगवान को भी साक्षी बनाकर हर सोमवार, हर गुरुवार का व्रत रखा। सोलह सोमवार और साल भर से अधिक समय तक निर्जला उपवास—न यह किसी फिल्म की स्क्रिप्ट है, न किसी कल्पना की उड़ान। यह रामना की एक वास्तविक बेटी का समर्पण है, जिसने रुपेश की सकुशलता के लिए अपनी देह को तपाया।

और जब रुपेश परीक्षा के दिन एक बड़े हादसे से बचकर लौटा, तब स्नेहा ने उसे अपने पैरों पर चलते देखकर जो आँसू बहाए, उनमें परमात्मा को कोसना नहीं, धन्यवाद था। वह रोई इसलिए कि उसकी तपस्या सफल हुई, उसका प्रेम बच गया। लेकिन भाग्य की विडंबना देखिए—जिस दिन वह लड़का मौत को चकमा देकर लौटा, उसी दिन से उसके अपनों ने स्नेहा की जिंदगी को मौत से भी बदतर तन्हाई में धकेलना शुरू कर दिया।

आज स्नेहा के पास न फोन है, न संवाद का कोई जरिया। चार साल तक जो आवाज उसकी साँसों में बसी थी, अब उस कंपन को भी अपराध घोषित कर दिया गया है। चुपके से उसकी शादी तय की जा रही है, मानो वह कोई वस्तु हो जिसे एक जाति की अलमारी से निकालकर दूसरी जाति की तिजोरी में बंद किया जा रहा है। स्नेहा के भीतर क्या बीत रही होगी, इसका अंदाजा उसी हृदय को हो सकता है जिसने कभी असीम प्रेम में डूबकर अपना सबकुछ दाँव पर लगा दिया हो। उसके रोम-रोम में एक ही चीख होगी—"जिस रुपेश के लिए मैंने भगवान को भी नहीं छोड़ा, उसी रुपेश को मुझसे छीनने के लिए घरवालों ने भगवान का भी सहारा छोड़ दिया।"

यह सोचकर कलेजा मुँह को आता है कि बेटी की खुशी से बढ़कर माँ-बाप को अपनी जाति की इज्जत प्यारी है। यह वही समाज है जो सरेआम कहता है कि "बेटी तो पराई होती है", लेकिन जब बेटी अपना जीवनसाथी चुनती है तब उसे याद आता है कि "बेटी तो हमारी जाति की इज्जत है"। कैसी विचित्र विडंबना है कि अगर स्नेहा और रुपेश किसी गलत काम में पकड़े जाते तो यही समाज तुरंत पुलिस या पंचायत के सामने शादी करवा देता—उस वक्त जाति नहीं पूछी जाती, बस बिरादरी की नाक बचानी होती है। लेकिन जब दो शरीफ इंसानों ने खुले आसमान के नीचे एक-दूसरे से प्यार किया, मंदिरों में माथा टेका, व्रत रखे, और कभी समाज से आँखें नहीं चुराईं, तब यही समाज उन्हें अपराधी मानकर खड़ा है।

स्नेहा पर क्या बीत रही होगी? रात की तन्हाई में जब उसे अपने सोलह सोमवारी व्रतों की याद आती होगी तो उसे लगता होगा कि क्या उसने गलत भगवान को पूजा? गुरुवार के उपवास जब तोड़े होंगे तो उसने सोचा होगा कि रुपेश की लंबी उम्र के लिए माँगी गई मन्नत अब उसकी खुद की साँसों को कैद कर रही है। अब उसे बताया जा रहा होगा कि "यही तो असली इज्जत है", जबकि सच यह है कि उसका चरित्र, उसकी पवित्रता, उसकी आत्मा सब रुपेश के साथ जुड़ चुकी थी। जिस दिन वह किसी और जाति के लड़के के साथ फेरे लेगी, उस दिन उसकी आत्मा नहीं, सिर्फ एक शरीर अग्नि के चक्कर लगाएगा। समाज के लिए शायद यही "पवित्रता" है, पर क्या माँ-बाप को एक पल भी नहीं लगता कि जिस बेटी का उन्होंने पालन-पोषण किया, आज उसका गला घोंटकर भी अगर समाज को खुश करना पड़े तो वे पीछे नहीं हटेंगे?

स्नेहा के मन में एक ही प्रश्न कौंधता होगा—क्या इतना अच्छा नहीं होता कि हम दोनों भागकर शादी कर लेते? न घरवाले मान रहे हैं, न समाज मानेगा, क्योंकि दोनों की जाति अलग है। यहाँ दोनों पक्ष मतलबी हैं—एक तरफ घरवाले हैं जिन्हें अपनी पसंद का जमाई चाहिए, चाहे बेटी जिंदा रहे या न रहे; दूसरी तरफ समाज है जिसे अपनी जाति का लड़का या लड़की चाहिए, भले ही सामने वाले की जिंदगी तबाह हो जाए। और माँ-बाप! वे समाज को खुश करने के लिए अपनी बेटी की खुशी का गला घोंटने से भी नहीं हिचकिचाएँगे। स्नेहा की इज्जत क्या होती है, यह उन्होंने उस दिन भी नहीं समझा जब वह दूसरी जाति के लड़के से प्यार कर बैठी, और न आज समझेंगे जब वह अपनी ही जाति के किसी अजनबी के हवाले कर दी जाएगी। क्या जाति के लड़के से शादी हो जाने भर से उसकी पवित्रता बनी रहेगी? क्या वह सचमुच जी पाएगी, या सिर्फ घरवालों और समाज को खुश रखने के लिए एक मशीन की तरह साँस लेती रहेगी?

यह समाज और ये घरवाले यूँ ही बेटियों की इज्जत से खेलते हैं। इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता कि बेटी की असली इज्जत उसकी आत्मा की शांति में है, न कि जातिगत साँचे में ढली शादी में। आज रामना की गलियों में एक बेटी चुपचाप घुट रही है। उसकी चुप्पी कभी गवाही देगी कि जाति के नाम पर प्रेम की हत्या करने वालों के हाथ सिर्फ खून से नहीं, एक बेटी की टूटी हुई आस्था से भी रंगे होते हैं。